ये कैसा है शोर यहां





ये कैसा है शोर यहां,

हर दूसरे कदम पर है मोड़ यहां,

रास्तों की मायाजाल है यहां,

भीड़ की न कोई अन्तकाल यहां,

ये कैसा है शोर यहां ,


दो वक्त की जिंदगी चलाने की जद्दोजहद,

न चाह कर भी  पहुंचते दूसरी सरहद,

इस्तकबाल तो मिल जाती उन्हे,

शौक घर कर लेती उनमें,

जैसे पंछी के घोंसलों की तरह,


उम्र बितती आसमान को देखते,

जमीं की तलब भी न छूटती,

घर संसार सब यही दिखते ,

इस शहर के शोर को सुनते,

न जाने कहां से आ गई ये शोर यहां ,


ये कैसा शोर है यहां,

इन बड़े शहरों की कैसी डोर बंधी यहां,

शोर में ही होती भोर,

शाम होती घनघोर,

रात की बंधी है सुबह से डोर,


ये कैसा है शोर यहां,

ये कैसा है शोर यहां।


~ आदित्य राय  

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